भारत एक ऐसा देश जहां दो विधान, दो निशान, दो प्रधान....

यह बात तब कि है.. जब भारत देश पुर्ण रुप से आजाद हुवा था..
तब के तत्कालिन प्रधानमंत्री  जवाहर लाल नेहरू जी के गलत कूटनिति के कारण जम्मु-कश्मीर का विवाद पडोसी मुल्क पाकिस्तान से शुरु हो गया था..
कश्मीर की आजादी के लिये तब से ही लड़़ाई शुरु हो गयी थी... अपने हि देश का अभिन्न अंग होते हुवे भी कश्मीर मे जाने के लिये अलग से परमीट लेना पड्ता था.. और उस समय कश्मीर मे शेख अब्दुल्ला प्रधानमंत्री  हुवा करते थे.. यानि एक हि देश मे दो प्रधानमंत्री..शेख अब्दुल्ला कश्मीर मे अगल विधान और सरकारी भवन पर भी कश्मीर का झंडा लगाते थे. कश्मीर मे धारा 370 अलग सविधान कि जो की देश के लिये कोड़ में खाज कि तरह था.. भारत देश के किसी हिस्से से कश्मीर में आने के लिये परमीट लेना पड्ता था. और ये बात देश के लोगो को बहुत
चुभती थी...
जब देश मे पहला आम चुनाव सन 1952 मे हुआ था तब भारतीय जन संघ ने चुनाव मे हिस्सा लिया और 3 सीटों के साथ हिंदुस्तान मे अपनी और अपने पार्टी के पह्चान बनाइ और देश को एक नया राजनितिक विकल्प मिला उस समय मे भारतीय जन संघ के प्रमुख डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे. डाक्टर मुखर्जी ने देशहित के लिये कश्मीर कि इस समस्या को निपटाने के खातिर उन्होने 1953 मे कानपुर से एक जन संघ आंदोलन आरम्भ किया और बिना परमिट के कश्मीर जाने कि बात कही उस समय डाक्टर मुखर्जी के साथ कइ लोगो ने भी हिस्सा लिया जिसमे अटल बिहारी वाजपेयी जी भी डाक्टर मुखर्जी के साथ इस आंदोलन का हिस्सा बने थे. डाक्टर मुखर्जी के इस आंदोलन से तब के मुस्लिम कोंफ्रेंस यानि अब के नेशनल कांग्रेस और नेहरु सरकार भी सकते मे आ गयी थी. आंदोलन का नारा था "एक देश दो विधान, दो प्रधान दो, निशान नही चलेंगे-नही चलेंगे"  आंदोलन धीरे-धीरे पंजाब के माधोपुर मे रावी नदी के तट पर पहुचे तब डाक्टर मुखर्जी ने अटल बिहारी वाजपेयी जी से कहा कि जाओ और देश वासियो से कहो कि मै कश्मीर बिना परमिट मे आ गया हु परन्तु देश कि राजनिति......




आगे कि कहानी...........................................  
28 जुन 2018 को पोस्ट कि जायेगी... 
जय हिंद.. जय हिंदुस्तान

भारत एक ऐसा देश जहां दो विधान, दो निशान, दो प्रधान.... भारत एक ऐसा देश जहां दो विधान, दो निशान, दो प्रधान.... Reviewed by Ranjeet Singh on 6/25/2018 Rating: 5

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